**आधुनिक तकनीक का उपयोग कर प्रदूषण किया जा सकता है कम।*
**ज्ञान का दीपक जलाए बिना करोड़ दिए जलाने से क्या फायदा।**
**जहां अज्ञानता है, वही दुख डर और चिंता भी है।**
**बरौनी/बेगूसराय/संवाददाता। महंत राम जीवन दास की रिपोर्ट
दीपों का पर्व दीपावली सनातनियों के लिए महान पर्व माना गया है। लेकिन संतों के अनुसार जब तक ज्ञान का दीपक नहीं जलाए तो बाहर करोड़ दिए जल लेने से अंधकार ही अंधकार मिलेगा। क्योंकि जहां अज्ञानता है वही दुख, भाई एवं चिंता भी है।
वर्ष 2025 का दिवाली पर्व दीपों की लड़ियां,बिजली बत्तियों की क्यारियां और पटाखों की गूंज के साथ पूर्ण हो गया।इस बार पटाखों पर प्रशासन द्वारा बैन भी नहीं था।इसको लेकर किसी तरह का पूर्व से दिशानिर्देश जारी नहीं हुआं और लोगों ने जम कर पटाखे जलाये।
यूं तो अधिकांश लोग पटाखों से दूर रहते थे। लेकिन परिवार के सदस्यों, मित्रों के प्रेम से लोग पटाखा प्रेमी बन ही जाते हैं।
पिछले 5-6 सालों से हर बार पटाखों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।दिवाली में जैसे जैसे पटाखे फूट रहे थे,विपक्षी गैंग के ट्वीट पोस्ट आते जा रहे थे..... AQI 600 हो गया, 800 हो गया, 1000 पार हो गया... कुछ जगह 1300-1500 भी दिखा रहा था।कोई कह रहा था कि दिल्ली एनसीआर रहने लायक नहीं रही..... कोई कल रात ही एनसीआर छोड़ कर भागने को बता रहा था।लेकिन कुछ ही घंटो में पूरे एनसीआर की AQI सामान्य स्तर पर आ गई..... 200-250 के बीच।यह एनसीआर में एक सामान्य स्तर है AQI का.... जो बारिश के मौसम को छोड़ कर अमूमन यही रहता है।
इसका अर्थ?
अर्थ यह है कि दिवाली को लेकर जो हो हल्ला मचाया जाता है... वह मात्र कुछ ही घंटो में सेटल्ड हो जाता है।
वैसे इस बार अभी तक पराली जलाने की घटनाएं भी पहले से कम हैं।
अगर ऐसा है तो यह अच्छी बात है.... और इस पर कंट्रोल हो जाए तो समस्या काफी हद तक सुलझ जायेगी।
लेकिन... अभी भी समस्या के मूल कारण का हल नहीं मिल पाया है।
अगर AQI सामान्य स्तर पर 200-250 रहता है, तो यह एक गंभीर बात है..... ना पूरे साल दिवाली होती है ,ना ही पराली जलाई जाती है।
प्रदूषण का मुख्य कारण है धूल धुंआ ,गाड़ियों का धुआँ, फैक्ट्री का धुआँ और कंस्ट्रक्शन..... इन पर आधुनिक टेक्नालॉजी का उपयोग करके कंट्रोल किया जा सकता है।


