प्रकृति संरक्षण और अखंड सौभाग्य का प्रतीक का वटसावित्री व्रत
आज वटसावित्री व्रत के साथ लग रहा है सोमवती अमावश्या का विहंगम संयोय
तेघरा बेगूसराय सच आज तक न्यूज़ राम आधार सहनी की खास रिपोर्ट
सनातन संस्कृति में स्त्रियां अखण्ड सौभाग्य की कामना के लिए विभिन्न प्रकार के व्रत पूजन आदि को करती है जिसमे से प्रमुख व्रतों में एक वटसावित्री का व्रत माना गया है। इस व्रत में सौभाग्यवती स्त्री अखण्ड सौभाग्य की कामना को लेकर बरगद के वृक्ष की जड़ में पूजन करती है।
*कब है वटसावित्री व्रत*
ज्योतिषाचार्य अविनाश शास्त्री के अनुसार 26 मई 2025 को प्रातः सूर्योदय के बाद 14 दंड 26 पल यानी दिन के 11 बज कर 02 मिंट तक चतुर्दशी तिथि रहेगी जिसके बाद अमावश्या तिथि का प्रवेश होगा जोकि अमावस्या तिथि पूरे दिन रात रहेगी यानी वट सावित्री का व्रत 26 मई 2025 सोमवार को होगा।
सोमवार को अमावस्या तिथि का होना सोमवती अमावस्या का योग भी बना रहा है। सोमवती अमावस्या में सौभाग्वती स्त्री पीपल के वृक्ष की जड़ में भगवान विष्णु का पूजन करते हुए 108 परिक्रमा करती है जो कि पुत्र पौत्र धन समृद्धि का कारक माना गया है। वटसावित्री व्रत के बरगद के वृक्ष की पूजा करते हुए सौभाग्यवती स्त्रियां अखण्ड सौभाग्य की कामना करती है। यानी इस वर्ष स्त्रियों के लिए वट सावित्री व्रत में पीपल एव बरगद दोनो पेड़ का पूजा करेंगी।
भारत की प्राचीन संस्कृति आर्यो की संस्कृति है और यह हिंदुओ की जीवन पद्धति बन गयी।
प्राचीन काल मे आर्य प्रकृति उपासक,थे और वृक्ष,नदियों,पहाड़ों की पूजा करते थे। आर्यो की इस जीवन पद्धति को आज भी भारत के सनातनी हिंदुओ अपनाये हुए है।जिसके अंतर्गत ज्येष्ठ की तपती गर्मी में पर्यावरण संरक्षण के लिए वरगद जैसे विशाल वृक्ष की पूजा उपासना करते हुए संरक्षण करते है। इस तरह हम कह सकते है कि वटसावित्री का व्रत एक धामिर्क पौराणिक परम्परा नही बल्कि पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति उपासना का प्रतीक है।






