एशिया प्रसिद्ध गढ़हरा की भौगोलिक रचना,कैसे नाम पड़ा गढ़हरा
बरौनी/ बेगूसराय/ सच आज तक संवाददाता महंत रामजीवन दास के कलम से गढ़हरा नाम कैसे पड़ा? पूर्व में क्या नाम रहा होगा और कैसे बदलते-बदलते अब गढ़हारा नाम हुआ। इसकी बड़ी ही रोचक गाथा है। यद्यपि किसी सरकारी दस्तावेज में (पुराने या नये) या कि राजपत्रों (गजट) में गढ़हरा का ऐतिहासिक उल्लेख नहीं मिलता है। अतएव बूढ़े-पुराने लोगों द्वारा बचपन से जो सुना जाता रहा है, उस आधार पर यह कहा जा सकता है कि लगभग चार सौ साल पूर्व गंगधारा कहा जानेवाला गाँव अब गढ़हरा है। आज के नौजवानों को आश्चर्य होगा कि गंगधारा से गढ़हरा कैसे बना? जिस तरह विभिन्न पेशेवर लोगों में विकास के कारण अनेक परिवर्तन होते रहते हैं, उसी तरह गाँवों, कस्बों, जनपदों और नगरों, यहाँ तक कि, देशों के नाम भी बदलते रहते हैं। सन् १९०६ ई. में बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित डिस्ट्रिक्ट गजेटियर से पता चलता है कि बंगाल सरकार के पुरातत्त्व विभाग के ५वें सर्वे रिपोर्ट से आज के मुंगेर का नाम चन्द्रगुप्तकाल में 'गुप्त गढ़' था। कष्टहरणी घाट के पास जंगल में मुद्गल ऋषि का निवास होने के कारण गुप्त शासन के बाद यह मुद्द्यालय कहलाया। संस्कृत के पंडितों ने मुद्गलपुरी कहना शुरू किया। यही बाद में मुद्गलपुरी से मुनिगृह, मुनिगेह से बदलते बदलते मुंगेर बन गया। पहले का बेगम सराय बेगूसराय बना, उसी तरह गंगा की धारा के पास होने के कारण गढ़हरा का नाम गंगधारा रहा होगा। कहा जाता है कि एक मुस्लिम फकीर ने वर्षा ऋतु में गंगा की उफनती धारा के पास अँगूठा रोपकर आगे बढ़ने से गंगा को रोकने का चमत्कार किया था। तब इस गाँव को गंगहारा कहा गया यानी जहाँ आगे बढ़ने से गंगा हार गयी हो। गढ़हरा गाँव में मौजूद मस्जिद के बारे में यह कहा जाता है कि उक्त फकीर के अँगूठा गाड़ने की जगह पर ही मस्जिद बनायी गयी थी। बाद में तो आमतौर पर बोलचाल में गरहरा ही बोला जाता और लिखा जाता था। बाहर के लोग तो 'गरहरा' को 'गरहारा' भी लिखते-बोलते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जलियाँवाला बाग नरसंहार काण्ड के उपरान्त नवजागरण की अँगड़ाई देश ले रहा था तभी इस जनपद में भी उसकी ध्वनि पहुँची थी। देशभक्तों की पूरी दो पीढ़ियों द्वारा क्रान्ति के साथ सारस्वत साधना का समन्वित रूप यहाँ विकसित हुआ, जिसके पुरोधा थे, क्रान्तिवीर सोनेलालजी।इनके कई अनुयायी ने भी गढ़हरा दर्पण परिवार बनाकर गढ़हरा के सामाजिक सांस्कृतिक चेतना को बढ़ाने का प्रयास किया है। बेगूसराय जिला का गढ़हरा, गाँव उत्तरी अक्षांश रेखा २४.२२ से २५.४९ एवं पूर्वी देशान्तर रेखा ८५.३६ से ८६.५१ के बीच अवस्थित है।कभी यह गाँव गंगा नदी के उत्तर बिल्कुल तट पर था। पर अब गंगा नदी गाँव से करीब सात किलोमीटर दक्षिण चली गयी है। गढ़हरा से सटे पश्चिम, वाया नदी है। उसे गाँव के लोग बोलचाल की भाषा में छोटकी गंगाजी कहते हैं। वाया नदी गंगा की ही शाखा है। सिमरिया गाँव के पास गंगा से अलग धारा निकली है। वहाँ से उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होकर बारो, तेघरा, चमथा, झमटिया, विद्यापति स्थान के पास से गुजरती हुई महुआ के आगे और हाजीपुर के पहले पुनः गंगा नदी में मिल जाती है। गढ़हरा के पश्चिमोत्तर बारो गाँव है। पूरब में रेलवे यार्ड के बाद बीहट गाँव का मसनदपुर टोला और दक्षिण में सिमरिया गाँव है। मोकामा में गंगा नदी पर पुल बनने के पहले गढ़हरा और सिमरिया के बीच रूपनगर नामक रेलवे स्टेशन था। यह बरौनी और सिमरिया घाट के बीच छोटी लाइन (मीटर गेज) का एकमात्र स्टेशन था। रूपनगर गाँव सिमरिया गाँव का टोला है। बरौनी प्रखण्ड के अन्दर गढ़हरा का तौजी नं. ८२९ और थाना सं. ४८६ है। गंगा नदी में कटाव के कारण वाया नदी के पश्चिम गंगा प्रसाद और जयनगर गाँव के निवासी भी गढ़हरा मौजे के दक्षिण में घर बनाकर बस गये हैं। ये लोग आज भी इस नव-निवास स्थान को गंगा प्रसाद और जयनगर ही कहते हैं। गढ़हरा के ग्रामीण भी इन्हें गढ़हरावासी नहीं मानते हैं। गढ़हरा और सिमरिया के बीच एक छोटा-सा गाँव चकबल है। यह पुरानी बस्ती है। गढ़हरा मौजा के अन्दर रहते हुए भी इस गाँव का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। उसी तरह गढ़हरा और बीहट के बीच एक स्वतंत्र अस्तित्ववाला गाँव कील (क्यूल) है। स्वतंत्र रहते हुए भी 'क्यूल-गढ़हरा' कहकर इसकी पहचान बनती है। क्योंकि, किऊल या क्यूल नामक बिहार में दूसरे भी गाँव हैं। पर गढ़हरा नाम का बिहार में दूसरा गांव नहीं होने के कारण यह स्वतंत्र अस्तिव का गांव है।






