अपने अस्तित्व पर आंसू बहा रही काजी रसलपुर का ऐतिहासिक धरोहर ।
बेगूसराय। काजी रसलपुर पंचायत का दो एतिहासिक धरोहर जिनकी अतीत में तूती बोलती थी, आज अपना वजूद खो दिया। मुगलों के जमाने में जब तेघड़ा मुजफ्फरपुर जिले का अनुमंडल था तब काजी जी का तख्त लगता था और दूध का दूध पानी का पानी न्याय मिलता था। काजी रसलपुर का प्राचीन इमारत का खंडहर और ईदगाह की ईंट आज भी मुगलकालीन शासन का गवाह बना हुआ है। ईदगाह का मैदान आज भी बच्चों के खेलने का मैदान है। अगर इसे चहारदिवारी से घेर नहीं दिया जाता तो इस ईदगाह के अस्तित्व मिट चुका होता। यहीं कारण है इस पंचायत का नाम काजी रसलपुर रखा गया। दूसरा एतिहासिक धरोहर दुलारपुर मठ है।जब जमींदारी छीनी गई तो कुछ दिनों तक मठ की हिफाजत के लिए प्रीवीपर्स दिया गया। लेकिन इन दिनों प्रीवीपर्स मिलना बंद हो गया। जिससे इस मठ के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया। यह मठ इलाके का सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था। दुर्गा पूजा के अवसर पर एक से एक गुणीजन आते थे। इस पंचायत की भौगोलिक स्थिति यह है कि इसे तेघड़ा प्रखंड में होना चाहिए। लेकिन अभी यह भगवानपुर प्रखंड की पंचायत है। भगवानपुर से इस पंचायत की दूरी जहां 15 किलोमीटर है। वहीं तेघड़ा अनुमंडल से इसकी दूरी मात्र एक किलोमीटर है। तेघड़ा स्टेशन का आधा भाग इसी पंचायत का हिस्सा है। इस पंचायत की मिट्टी इतनी उर्वरा है कि राजेश चौधरी जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी को पैदा किया है जो नौकायन स्पर्धा में एशियाड में कांस्य पदक विजेता बना। डॉ सच्चिदानंद पाठक जैसे लोक गायक और कवि हुए। मंगल पाठक इसी पंचायत के थे जिनका मिथिला पंचांग बनाने में अहम भूमिका निभाई। इसी पंचायत की भुवनेश्वर सिंह है जो कृषि मंत्री के निजी सचिव के पद पर रहे। जिस पंचायत का अतीत इतना गौरवशाली है वह इन दोनों सरकारी उदासीनता का दंश से झेल रहा है। सरकारी नलकूप वह हाथी दांत साबित हो रहा है। विष्णु देव नारायण उच्च विद्यालय तेयाय की भी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है। इस पंचायत की जीविकाएं कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। महंगी खाद बीज के साथ ही वहां के किसान निजी नलकूपों से 150 रुपया प्रति घंटा के दर से।फसलों की सिंचाई करने को विवश हें। डॉ सच्चिदानंद पाठक का कहना है कि शिक्षा के लिए जैसे सुंदर भवन बना है ऐसी सुंदर भावना भी सरकार और समाज की बननी चाहिए। स्वरूप और स्वभाव का समन्वय संस्कार युक्त शिक्षा की पहचान है



