मृत्यु भोज वेद - शास्त्र का हिस्सा नहीं, यह गरीबों के लिए अभिशाप भी है।
तेघड़ा से आर एम न्यूज़ मीडिया संवाददाता अशोक कुमार ठाकुर की खास रिपोर्ट
तेघड़ा /बेगूसराय
मृत्यु भोज एक सामाजिक बुराई ही नहीं बल्कि गरीबों के लिए अभिशाप के समान है। अमीर व संभ्रांत लोग मृत्यु भोज में बड़ी संख्या में लोगों को खाना खिलाकर अपना रुतबा समाज में कायम करने का प्रयास करते हें। लेकिन यह रुतबा गरीबों के लिए अभिशाप बन जाता है। रीति रिवाज के चलते उन्हें कर्ज लेकर या फिर चल और अचल संपत्ति बेचकर ना चाहते हुए भी मृत्यु भोज करना होता है। रात गांव के पूर्व सरपंच सह सिने स्टार राकेश कुमार महंत एवं उनके साथी कलाकारों के द्वारा लघु फिल्म मृत्यु भोज एक अभिशाप की ट्रेलर से मृत्यु भोज का समाज से सामूहिक बहिष्कार हो लोगों का पूरा समर्थन मिल रहा है। यह वर्तमान समय की मांग भी है। मृत्यु भोज में शामिल नहीं होने का निर्णय और संकल्प लेने की दृश्य को काफी समर्थन मिल रहा है। फिल्म के ट्रेलर के माध्यम से दर्शाया गया है।मृत्यु भोज किसी वेद-शास्त्र का हिस्सा नहीं है। इसे समाज पर थोपा गया है, जिसे दूर होना चाहिए।
वेद में कहीं से भी मृत्यु भोज का जिक्र नहीं है। जब आदमी सहित किसी भी प्राणी की मौत होती है तो वह उसके तुरंत बाद नया जीवन धारण कर लेता है। ईश्वर की ऐसी व्यवस्था है कि कोई भी आत्मा शरीर बदलने के बाद तुरंत दूसरा शरीर धारण कर लेता है। ऐसे में स्वर्ग और नर्क की बातें कहां से आती है। समाज को गलत दिशा में धकेलने के लिए तरह-तरह के अंधविश्वास फैलाने का काम किया, जिसका भुक्तभोगी वर्तमान समाज भी हो रहा है। मृत्यु भोज में अधिक से अधिक खर्च उठाकर लोग आर्थिक रूप से परेशान होते रहे हें। इस दिशा में सरकार और सामाजिक संस्थाएं को भी बाल विवाह, दहेज प्रथा और नशा उन्मूलन अभियान की तर्ज पर कुप्रथा मृत्यु भोज सहित समाज में फैली अन्य भ्रांतियों के खिलाफ अभियान चला कर लोगों को जागरूक करना चाहिए। सफलता जरूर मिलेगी।



