अंत्येष्टि_संस्कार के उपरांत मृतकभोज शास्त्रोक्त नहीं हैं-अंत्येष्टि संस्कार
बरौनी/ बेगूसराय / सच आज तक न्यूज़ संवाददाता महंत रामजीवन दास की रिपोर्ट
आत्मा के द्वारा शरीर का त्याग कर देने के पश्चात उस निर्जीव शरीर के विधि पूर्वक किये गए दाहकर्म को अंत्येष्टि संस्कार कहते हैं। यह उस शरीर से सम्बद्ध अन्त्य(अंतिम) इष्टि(यज्ञ) हैं।अतः इस कर्म का नाम अंत्येष्टि हैं।नर(मनुष्य) अथवा पुरुष(मनुष्य) से सम्वद्ध याग (यज्ञ) होने के कारण इसे नरयाग अथवा पुरुषयाग भी कहते हैं।नर(मानव देह) अथवा पुरुष के पार्थिव आदि तत्वों को यथा समय दाहकर्म के द्वारा पृथ्वी,जल,आदि भूतों (पदार्थों) में मेध करने (पवित्रतापूर्वक मिलाने) के कारण इसे नरमेध या पुरुषमेध भी कहा जाता हैं।
जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसके शव को जलाकर पांच तत्वों में विलीन कर दिया जाता हैं।यही अंतिम सोलहवां अंत्येष्टि संस्कार हैं। *महर्षि दयानन्द सरस्वती जी लिखते है -- "अंत्येष्टि कर्म उसको कहते हैं कि जो शरीर के अंत का संस्कार हैं,जिसके आगे उस शरीर के लिए अन्य कोई संस्कार नही हैं*,इसी को नरमेध,पुरुषमेध,नरयाग,पुरुषयाग भी कहते हैं। *महर्षि दयानन्द का यह कथन कि इसके आगे शरीर के लिए अन्य कोई संस्कार नही हैं,बहुत ही महत्वपुर्ण हैं।हम समाज में देखते हैं कि व्यक्ति के मरने के बाद उसके नाम से अनेक प्रकार के पाखण्ड और आडम्बर किये जाते हैं।जैसे मृत व्यक्ति की हड्डियां ले जाकर गंगा आदि नदियों में पहुंचाई जाती हैं, ताकि उसकी सद्गति हो जाये, उसके नाम पर कालांतर में श्राद्ध आदि किये जाते हैं,ताकि मृतक को भोजनादि मिल सके।उसके नाम पर अनेक प्रकार के दान - पुण्य आदि किये जाते हैं ताकि उनके पाप-कर्मों का क्षय हो सके। वास्तविकता यह है कि मृत्यु के बाद उस व्यक्ति के शरीर को जला दिया जाता है,और जीवात्मा अपने कर्मो का फल भोगने के लिए परमात्मा की न्याय व्यवस्था में चला जाता हैं।*
परमात्मा की न्याय व्यवस्था के अंतर्गत ही उसे या तो मुक्ति मिल जाती हैं,या मनुष्य योनि मिल जाती हैं, या फिर पशु-पक्षियों आदि की योनि मिल जाती हैं। *क्योंकि शरीर की मृत्यु होते ही जीवात्मा,सूक्ष्म शरीर पर पड़े अच्छे या बुरे संस्कारों सहित परमात्मा की न्याय व्यवस्था में चला जाता हैं*।इसलिए सूक्ष्म शरीर पर पड़े हुए संस्कारों अर्थात व्यक्ति के कर्मो में किसी प्रकार का घटाना- बढाना नही हो सकता हैं।मृत व्यक्ति के नाम पर हम चाहें दान-पुण्य करें या उसकी हड्डियों को किसी पवित्र नदी में वहा दें,इससे कोई भी अंतर नही पड़ता ।
इसी प्रकार उसके नाम पर श्राद्ध आदि करना भी बुद्धिहीनता तथा कोरा पाखण्ड ही हैं,क्योकि यह सब उस व्यक्ति को नही मिलता हैं। हाँ, पात्रता के अनुसार दान-पुण्य करना व विद्वानों को भोजन आदि खिलाना अच्छी बात हैं तथा इसका फल भी अच्छा हैं,मगर वह सब उस मृत व्यक्ति को नही मिलेगा,बल्कि उन व्यक्तियों को मिलेगा जो यह सब कर रहें हैं। व्यक्ति को जीते-जी ही अच्छे-अच्छे कर्म तथा दान-पुण्य और परमात्मा की आराधना करनी चाहिए, ताकि वे संस्कार हमारे सूक्ष्म शरीर पर पड़े और उन संस्कारों के अनुसार हमें सद्गति प्राप्त हो । क्योकि शव के दाह होने पर स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाता हैं।सूक्ष्म शरीर जिसमें इंद्रियां,मन व बुद्धि रहती हैं,जीवात्मा के साथ चला जाता हैं, और ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार उसको जहाँ नया शरीर मिलना हो वहॉं गर्भ में जाता हैं, और गर्भ के भीतर इस सूक्ष्म शरीर में भी आवश्यक संशोधन वृद्धि होती हैं।और नया स्थूल शरीर बनता हैं। यह पुनर्जन्म के अनुसार नया शरीर बनने की विधि है।
प्रश्न- क्या मृतक की अस्थियों को हरिद्वार या पुष्कर आदि तीर्थ-स्थानों पर ले जाकर उन्हें गंगा आदि नदियों अथवा किसी सरोवर के जल में डालना चाहिए ?
उत्तर- नही । अस्थियों को किसी भी जल में नहीं डालना चाहिए,प्रत्युत उन्हें पूर्वोक्त विधि से भूमिसात ही करना चाहिए। अंत्येष्टि संस्कार के द्वारा शरीरस्य जल वाष्प बनकर पुनः जल में ही मिल गया,अग्नि-तत्व अग्नि में,वायु-तत्व वायु में और शेष रहा भस्म अस्थि रूप पार्थिव तत्व,उसे भी पार्थिव अंशों (मृत्तिका) में ही विसर्जित करके मिश्रित कर देना चाहिए।अस्थियोँ को जल में डालने से जल अशुद्ध विकृत और अनुपयोगी हो जाता हैं,अतः जल में डालना अनुचित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि "अस्थियोँ में फास्फोरस होता हैं,अतः उनसे जल विकृत या अशुद्ध नहीं होता"। वे लोग थोड़ा विचार करें। फास्फोरस के अतिरिक्त भी अस्थियोँ में बहुत कुछ होता हैं ।जो जल की अशुद्धि का हेतु बनता हैं।वे लोग,फॉस्फोरस वाली अस्थियोँ को अपने घर मे तो क्या, घर की बगिया के कुंड के जल में भी डालना पसन्द नहीं करेंगे, क्यों? इसलिये कि उन्हें ज्ञात है कि इससे वह जल अशुद्ध तथा दूषित हो जाएगा। तब फिर गंगा आदि नदियों अथवा सरोवरों के जल को क्यों मलिन या अशुद्ध करना ? इस विषय में कुछ लोगों को भ्रान्ति है कि "अस्थियोँ को गंगा आदि के पवित्र जल में न डालने से मृतक की आत्मा को शान्ति नही मिलती"। यह बात विचार और दृष्टांत इन दोनों दृष्टियों से सही नहीं हैं। आत्मा को शान्ति तो उसके शुभ कर्मों के अनुसार ही मिलेगी। अस्थियोँ के कहीं डालने या न डालने से आत्मशांति का कोई लेना-देना नही हैं। जीवितावस्था में भी शरीर को गंगा आदि के किसी भी जल में स्नानादि कराने से आत्मा शुद्ध नहीं होती जैसे कि महाभारत में भीष्म वचन हैं- "न वरिणा शुध्य्ति च अंतरात्मा" । अज्ञात स्थान गत आत्मा के उस अस्थि -अवशेष के जल-विसर्जन से शुद्ध होने की सर्वथा ही सम्भवना नही हैं। *अतः जल में अस्थि भस्मी के प्रवाहित न करने से आत्मा की शांति,अशुद्धि या भटकने की बात सर्वथा कल्पित हैं*। प्रसिद्ध वैदिक धर्मोद्धारक स्वामी दयानंद जी सरस्वती के अस्थि -अवशेषों को अजमेर स्थित शाहपुरा के बाग की भूमि में मृत्तिका सात किया गया था। इनके अलावा सैकड़ो उदाहरण हैं।इन प्रसंगों में इतने वर्ष बीतने पर भी कहीं कोई आत्मा के भटकने की कोई अप्रिय घटना नही हुई। सत्य-असत्य को जानने एवं वैचारिक क्रांति के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती की अमर कृति सत्यार्थ प्रकाश अवश्य पढ़ें।



