बलान नदी के अस्तित्व पर खतरा, अतिक्रमण और गंदगी का अंबार नदी पर्यावरण पर अतिक्रमण व संवेदनहीनता का प्रदूषण
जीवन दायिनी कही जाने वाली बलान नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। नदी किनारे घाट तो बन गए हें लेकिन नदी की सफाई अब तक नहीं हो पाई है। राज्य व केंद्र सरकार नदियों की सफाई और अतिक्रमण मुक्त करने के लिए कई योजनाएं चला रही है और इसके लिए प्रतिबद्धता भी जताती है। लेकिन उत्तर तेघड़ा के दर्जनों गांव से गुजरने वाली बलान नदी की व्यापक दुर्दशा से नदी का आंचल वर्षों से गंदगी से मैला होता जा रहा है। और यह नदियां सरकार से अपनी अस्तित्व बचाने की गुहार लगा रही है। आलम है कि बलान नदी प्यासी और बीमार है। नदी में पानी नहीं है और जो है उसमें सड़ांध है। बलान में नहाने से खुजली और चर्म रोग बहुत बड़ी समस्या है। बलान नदी जलकुंभी से भरी एक गंदे नाले में परिणत हो गयी है। नदी पर आश्रित लाखों मछुआरों की आजीविका चली गयी है। बलान नदी क्षेत्र के लाखों मछुआरे रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हें । नदी के किनारे का जल स्तर गिरता जा रहा है। जिसके चलते आज गांव-गांव में भूगर्भीय जलस्तर पाताल में जा रहा है। सदियों से बहने वाली नदी में अब धार्मिक अनुष्ठान सहित छठ पूजा का अर्घ संभव नहीं है। नदी पर आश्रित नदी तटीय 50 गांवों का जीवन त्रस्त है। बड़ी संख्या में चिल्हाय से लेकर विभिन्न गांवों के लोग तो अपने शौचालय के मलबे को इसी नदी में प्रवाहित कर रहे हें ।
*आंख मूंद कर बैठा है प्रशासन*
भू माफिया नदी के गोद में स्थाई और अस्थाई अतिक्रमण करके नदी की जमीन को कब्जा करके घर बनाने एवं खेती करने तथा बड़े पैमाने पर मिट्टी की अवैध कटाई में लगे हुए हें। अतिक्रमण मुक्त करने के क्षेत्र में नदी के जमीन की मापी के लिए पहले भी आदेश आया था, फिर भी आज तक मापी नहीं हुई है। इन सभी समस्याओं को नजरअंदाज करते हुए जिला प्रशासन आंख मूंद कर बैठा हुआ है। यदि ऐसी ही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में नदी का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा । वर्तमान में नदी का स्वरूप गंदी नाली में परिणत हो चुका है। जलकुंभी की सफाई और नदी की उड़ाही नदी प्रबंधन की प्राथमिक शर्त है* चिल्हाय पंचायत के मुखिया अरविंद कुमार, पकठौल के मुखिया पंकज सहनी,मत्स्यजीवी प्रबंध कार्यकारिणी सदस्य राजकुमार सहनी, जितेंद्र सहनी ,के अलावे बुद्धिजीवियों का कहना है कि जिला प्रशासन की लापरवाही और सरकार की उदासीनता की वजह से आज बलान नदी का नामोनिशान मिट रहा है। इसके संरक्षण और बचाव के लिए मनरेगा स्कीम के तहत पंचायत के माध्यम से नदियों की उड़ाही और सफाई किए जाने की जरूरत के साथ ही सैकड़ो की संख्या में शौचालय के मलबे को नदी में गिराने पर प्रशासनिक रूप से प्रतिबंध के साथ ही अवैध खनन एवं अतिक्रमण मुक्त करने को लेकर जिला प्रशासन को मुहिम चलाने की आवश्यकता है।










