द्वापर युग का प्रारंभ हुआ अक्षय नवमी से ,जप तप और दान से सभी पापों की मुक्ति मिलती है:स्वामी चिदात्मन जी महाराज
तेघड़ा से आर एम न्यूज़ मीडिया संवाददाता अशोक कुमार ठाकुर की खास रिपोर्ट
सिमरिया /बेगूसराय
इस समय वैवस्वत मन्वंतर के अठाइसवें कलयुग में सतयुग का उत्सव मना रहे प्राकट्य पुनीत कार्तिक माह के अक्षय नवमी तिथि को ही हुआ था इस प्रकार वैशाख महीना के शुक्ल पक्ष के तृतीया को जिसे हम अक्षय तृतीया के नाम से जानते हें ।उस दिन से त्रेता युग का आरंभ होता है भाद्र महीना में द्वापर में और माघ महीना में कलयुग का प्राकट्य हुआ है वेदव्यता ऋषियों ने शोध में यह पाया की अनंतानंत ब्रह्मांड हें ।जिसमें सूर्य चंद्रमा बृहस्पति ग्रह आदि के योग से दिन रात सप्ताह पक्ष महीना और वर्ष बनता है जिसमें पुनीत कार्तिक महीना में सतयुग का प्राकट्य होता है यह अविनाशी तत्व है जब तक प्रकृति है तब तक यह विधान है युग परिवर्तन होता है जिसमें प्रतिवर्ष इनका योग आता है जैसे सनातन धर्मा लंबी कोई भी पूजा अनुष्ठान करते हें तो प्रथम पंचोंपचार के साथ ब्रह्मांड का प्रतीक कलश पूजन करते हैं जिसमें प्रकृति के सारे तत्वा त्मक ज्ञान निहित है और पुनीत कार्तिक माह में शास्त्रोक्त सतयुग का प्राकट्य होता है और उसमें सनातन धर्मावलम्बीयों के द्वारा तप दान और यज्ञ के द्वारा जीवन लाभ लेते हैं और इससे विश्व ब्रह्मांड का भी कल्याण होता है। इस अवसर पर सिद्धाश्रम के व्यवस्थापक रविंद्र ब्रह्मचारी ,मीडिया प्रभारी नीलमणि ,सर्वमंगला समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र चौधरी, श्याम झा राम झा ,लक्ष्मण झा, राजेश झा, दिनेश झा, आचार्य नारायण झा ,रमेश झा ,शिबू झा ,सदानंद झा समिति की अध्यक्षा मंजू देवी सहित सैकड़ो श्रद्धालु शामिल हुए।


