कचरे के ढ़ेर में भविष्य ढूँढने को मजबूर बचपन कचरे की ढ़ेर पर दो जून की रोटी तलाश रहे बच्चे कंधों पर किताबों के बस्ते की जगह कूड़े की बोरी
तेघड़ा / बेगूसराय
देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है जिसमें 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है। लेकिन कुछ संख्या में अब भी गरीब नौनिहाल शिक्षा से वंचित हें। तेघड़ा नगरीय बाजार एन एच 28 हाईवे के किनारे, प्रखंड मुख्यालय के इर्द-गिर्द, नगर एवं ग्रामीण क्षेत्र में अहले सुबह से लेकर दोपहर तक कूड़े की ढ़ेर में प्लास्टिक, लोहा आदि कावड़ चुनते दर्जनों बच्चे दिख जाते हें। जिन हाथों में किताब कॉपी होनी चाहिए वह बच्चे 2 जून की रोटी के लिए कूड़ा चुन रहे हें। पीठ पर किताबों की बोझ नहीं बल्कि प्लास्टिक बोरी में रद्दी और गंदगी रहती है। होश संभालते ही बीमारियों की परवाह किए बिना कूड़े के ढ़ेर से ही अपनी दिनचर्या की शुरुआत करते हें। शुक्रवार की सुबह एन एच 28 से लेकर प्रखंड मुख्यालय होते स्टेशन की ओर कई बच्चे जिनका उम्र 10 से 17 वर्ष के बीच था वह कचरा चुनते नजर आए। कबाड़ चुनते छोटे बच्चों की टोली सरकारी घोषणा और वायदों की हकीकत बयां कर दे रहे हें। ठंडी ,बरसा हो या तपती धूप ये बच्चे लोहा, प्लास्टिक सहित कबाड़ इकट्ठा कर बिक्री करते है। कचरे के ढ़ेर में भविष्य तलाशने वाले इन छोटे- छोटे बच्चे जिनकी उम्र स्कूल जाने की होती उन्हें भूख की चिंता सता रही होती। लोगों की नजर में ये गंदे बच्चे होतें हें, गरीबी एक गंभीर समस्या है, जो चलती ही आ रही है | लेकिन इनकी बदहाल स्थिति से इनके परिवार के स्तर के बारे में पता चलता है। कि ये किस तरह अपने परिवार में रह रहे हें । इनके परिवार की स्थिति क्या है ? और गरीबी ने इन्हें कितना मजबूर किया है।रोजमर्रा के काम के आधार पर अपना और अपने परिवार का भरणपोषण करते है, इन तक सरकारी योजनाओं का लाभ भी समुचित रूप से नहीं पहुंच पाता है । ये बच्चे भी हमारे देश का ही हिस्सा है। ये बच्चे तो बेकसूर है, सरकार के कल्याणकारी योजनाओं से भी हमेशा वंचित रहते हें, ऊपर से गरीबी का दंश इन्हें झेलना पड़ता है। ऐसे में उन बच्चों की शिक्षा में व्यवधान होना स्वाभाविक है। बच्चे भी अपनी छोटी सी उम्र में अपने परिवार की स्थिति को देखते हुए कचड़े की ढ़ेर से प्लास्टिक या कुछ जरुरी वस्तु चुनते रहते हें, जिसे बेच कर 10 - 20 रूपये होने की चाह में लगे रहते हें। छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी कहाँ तक सही है? इनकी किस्मत क्या यही है। सरकार को चाहिए कि वे उन योजना को धरातल पर लाने की ओर विशेष ध्यान दें, ताकि सम्मुख रूप से उन बच्चों तक लाभ आसानी से पहुँच सकें। जिससे बच्चे अपने जीवन को खुशहाल तरीके से निर्वहन कर बेहतर भविष्य बनाने की ओर अग्रसर हो सके ।




