तिल तिल कर खत्म हो रहा है अनुमंडलीय मुख्यालय का एकमात्र ऐतिहासिक दनियालपुर पोखर अपनी बदहाली देख बहा रहा आंसू ।
तेधड़ा , बेगूसराय
अनुमंडलीय मुख्यालय के N H
28 से सटे नगर परिषद कार्यालय व मध्य विद्यालय दीनदयालपुर के पास स्थित पोखर अपनी दयनीय स्थिति का रोना कई वर्षों से रो रहा है । इतिहास गवाह है कि पंचायत से नगर पंचायत के बाद उत्क्रमित कर नगर परिषद भी बनाया गया लेकिन अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने इसके कायाकल्प को लेकर कोई कदम नहीं बढ़ाया। बिहार के सबसे महत्वपूर्ण लोक आस्था का त्योहार मात्र कुछ दिन बचा है। लेकिन इस बार भी पोखर की साफ सफाई, घाटों के निर्माण आदि कार्यों पर कोई पहल होता दिख नहीं रहा है। दनियालपुर, हसनपुर, तेघड़ा बाजार सहित आधे दर्जन गांव से सैकड़ो घरों के परिवार इस पोखर के घाट पर अर्द्ध देने पहुंचते थे । यहां छठ पूजा के साथ ही कई सभ्यता और संस्कृति के पोशाक के साथ - साथ धार्मिक अनुष्ठान कार्य में भी इस पोखर कि अहम भूमिका होती थी। लेकिन दुर्भाग्य है वर्तमान में पोखर के घाटों के चारों तरफ लगी गंदगी और झाड़ियों के अंबार से ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि यह जगह इतना महत्वपूर्ण भी रहा है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं जल जीवन हरियाली, जल संरक्षण तथा मनरेगा के तहत भी इस पोखर का सौंदर्यीकरण हो सकता था। परंतु अभी तक किसी पदाधिकारी और प्रतिनिधियों ने इसके तरफ कदम नहीं बढ़ाया। प्रशासनिक उदासीनता के कारण यह धरोहर अपना मूल स्वरूप खोता जा रहा है । दशकों बीत गया मगर आज तक इस ऐतिहासिक पोखर का कायाकल्प नहीं हो सका। तौजी 5523 एवं खेसर 11205 इतने बड़े भूखंड पोखर और भिंद सहित लगभग चार बीघा पर विस्तारित यह पोखर को पर्यटक स्थल बनाने की योजना सरकारी फाइलें में दम तोड़ रही है। वर्षो पूर्व खोदे गए यह पोखर अतिक्रमण के कारण इसकी स्थिति अब काफी बदल गई है। पोखर के भींद पर बनाए गए मकानों का गंदा पानी पोखर में जाता है। कूड़ा करकट और गंदगी फेके जाने के कारण पानी दूषित हो गया है। अगर सरकार इसको पर्यटन के रूप में विकसित कर दे तो यह जगह और खूबसूरत हो जाएगा साथ ही सरकारी राजस्व भी बढ़ेगा। स्थानीय लोगों ने बताया कि इस पोखर व पोखर की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कर चारों ओर घेराबंदी करने की जरूरत है। अगर यह पोखर का घेराबंदी हो जाता है और इसका साफ सफाई कर दिया जाता है। तो छठ के मौके पर श्रद्धालुओं को सुविधा होगी । क्योंकि यहां कई गांव के लोगों को इस महान आस्था के पर्व को मनाने के लिए 4 से 5 किलोमीटर गंगा घाट जाना पड़ता है जो घाट भी खतरनाक है। प्रशासनिक एवं जनप्रतिनिधि स्तर से इसकी सुरक्षा तथा इसके संरक्षित करने के लिए अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस पोखर का एक दिन वजूद ही समाप्त हो जाएगा। और अगली पीढ़ी को यह मालूम भी नहीं हो सकेगा कि यहां कोई ऐतिहासिक पोखर हुआ करता था। जिसके कारण इस गांव को एक अलग पहचान मिली थी


