साबरी मस्जिद में जश्न-ए-गौसुल वरा की रूहानी महफ़िल उलमा-ए-किराम, नातख्वां हज़रात और बड़ी संख्या में अक़ीदतमंद हुए शामिल
नई दिल्ली। लक्ष्मी नगर स्थित साबरी मस्जिद, दरगाह घासी पीर में गुज़िश्ता रात नमाज़-ए-ईशा के बाद “जश्न-ए-गौसुल वरा” के उनवान से एक शानदार दीनी व रूहानी महफ़िल का आयोजन किया गया। महफ़िल में उलमा-ए-किराम, आइम्मा-ए-किराम, नातख्वां हज़रात तथा बड़ी संख्या में अवाम और अक़ीदतमंदों ने शिरकत की।
कार्यक्रम का आग़ाज़ कारी अरमान फारूकी की तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक से हुआ। इसके बाद उन्होंने बारगाह-ए-रिसालत ﷺ में नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ पेश की। जनाब बशीर फरीदी साहब ने भी नात-ए-पाक का नज़राना पेश किया, जिसे हाज़िरीन ने पूरी अकीदत और मोहब्बत के साथ सुना।
महफ़िल की निज़ामत मौलाना डॉक्टर मोहम्मद मुस्तफा रज़ा, इमाम व ख़तीब साबरी मस्जिद ने की। उनकी प्रभावी निज़ामत के चलते कार्यक्रम में नज़्म-ओ-ज़ब्त और दिलचस्पी आख़िर तक बरक़रार रही।
इस अवसर पर हज़रत मौलाना मोहम्मद अलाउद्दीन नक्शबंदी, इमाम व ख़तीब नूरी मस्जिद, महरौली शरीफ, दिल्ली ने ख़ुसूसी तकरीर फरमाई। उन्होंने हज़रत गौस-ए-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु की सीरत, तालीमात और दीनी व रूहानी ख़िदमात के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डालते हुए शरीअत व सुन्नत की पाबंदी, तक़वा, इख़लास और नेक आमाल की अहमियत बयान की।
उन्होंने अल्लाह वालों से निस्बत और नेक व सालेहीन की सोहबत की अहमियत पर भी ज़ोर देते हुए कहा कि सालेहीन की सोहबत इंसान की ज़िंदगी और किरदार पर गहरा असर डालती है तथा उसे नेकी, तक़वा और अल्लाह तआला की इताअत की ओर राग़िब करती है।
महफ़िल को मौलाना डॉक्टर अब्दुल क़ादिर मिस्बाही, दिल्ली तथा मौलाना रियाज़ क़ादरी, इमाम व ख़तीब मस्जिद गरीब नवाज़, लक्ष्मी नगर ने भी ख़िताब किया। मुकर्रिरीन ने हज़रत गौस-ए-आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु की दीनी व रूहानी ख़िदमात, तालीमात और उम्मत की इस्लाह के लिए की गई जद्दोजहद के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
महफ़िल की सदारत पीर-ए-तरीक़त हज़रत अल्लामा मौलाना सैयद गुलाम रसूल नक्शबंदी साहब क़िबला, सज्जादानशीन ख़ानक़ाह हुज़ूरिया सरिया शरीफ, आज़मगढ़ ने फरमाई। सदारती ख़िताब में उन्होंने हाज़िरीन को दीनी ज़िंदगी अपनाने, शरीअत व सुन्नत से वाबस्ता रहने और औलिया-ए-किराम की तालीमात को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की तलक़ीन की।
इस अवसर पर मौलाना इसरार रौनक साहब, कारी आसिम साहब, हाफ़िज़ वसीम रज़ा साहब, अब्दुस्समद साहब और कारी मेहताब साहब समेत कई उलमा व अहबाब ख़ुसूसी तौर पर मौजूद रहे।
महफ़िल के आख़िरी चरण में सलात-ओ-सलाम पेश किया गया। इसके बाद हज़रत मौलाना सैयद गुलाम रसूल नक्शबंदी साहब क़िबला ने रक़्क़तअंगेज़ दुआ फरमाई। दुआ के दौरान हाज़िरीन पर रूहानी कैफ़ियत तारी रही और पूरी महफ़िल अकीदत व मोहब्बत के माहौल से सरशार हो गई।
कार्यक्रम के इख़्तिताम पर शरीक-ए-महफ़िल हज़रात में शरीनी तक़सीम की गई। महफ़िल को कामयाब बनाने में सदर-ए-मस्जिद जनाब शबन साहब, शाह आलम साहब, ताहिर भाई, शहज़ाद भाई, मोहसिन भाई, इरफान, चांद, सलीम, रफीक़, इनायत, अरबाज़ और अरशद समेत दीगर अहबाब ने भरपूर मेहनत और तआवुन किया।
आख़िर में मुन्तज़िमीन की जानिब से तमाम उलमा व मशायख, मेहमानान-ए-गिरामी, नातख्वां हज़रात और तमाम शरीक-ए-महफ़िल का शुक्रिया अदा किया गया। महफ़िल मजमूई तौर पर अकीदत, मोहब्बत और रूहानी कैफ़ियत से भरपूर रही।




