प्रिय तेघड़ा की जनता, मैंने राजनैतिक जीवन की शुरुआत छात्र जीवन में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़कर की। युवावस्था में ही संघ और संगठन के आदर्शों को आत्मसात करते हुए मैंने संकल्प लिया था कि राजनीति मेरे लिए पद या प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का मार्ग बनेगी।
वर्ष 2001 से 2010 तक मैं पंचायत प्रतिनिधि रहते हुए बेगूसराय ज़िले के भारतीय जनता पार्टी संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करता रहा। उस दौरान कार्यकर्ता के रूप में गाँव-गाँव, घर-घर जाकर संगठन को मज़बूत करने का कार्य किया। यही वह दौर था जब संगठन ने मुझे समझाया कि राजनीति में सफलता नहीं, सेवा ही असली लक्ष्य है। वर्ष 2010 में संगठन ने मुझे एक ऐसी विधानसभा से प्रत्याशी बनाया, जो 48 वर्षों से वामपंथ के जंजीरों में जकड़ी हुई थी। यह चुनाव केवल एक सीट जीतने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि विचारधारा और परिवर्तन की ललकार थी। संगठन के सहयोगियों, कार्यकर्ताओं, तेघड़ा के 40 पंचायतों के मेरे अपने परिवारों, मित्रों, शुभचिंतकों और जनता के अपार स्नेह के कारण हमने वामपंथ के किले को ढहाकर भाजपा के भगवा परचम को तेघड़ा की धरतीभगवा परचम को तेघड़ा की धरती पर फहराया। 2015 में जब चुनाव आया, तो स्वाभाविक रूप से मन में आशा थी कि संगठन मुझे पुनः अवसर देगा। परंतु पार्टी ने हमारे वरिष्ठ साथी श्री रामलखन सिंह जी को प्रत्याशी बनाया। संगठन के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए मैंने तन, मन और धन से उनका साथ दिया। यह मेरे लिए कठिन समय था - पर मैंने कार्यकर्ता धर्म निभाया। क्योंकि मेरा विश्वास है कि व्यक्ति से बड़ा संगठन होता है, और पद से बड़ा सिद्धांत। हालांकि सामाजिक और क्षेत्रीय परिस्थितियों के कारण महागठबंधन की जीत हुई, पर मैंने जनता के बीच रहकर निरंतर जनसेवा जारी रखा - एक सेवक की तरह, एक कार्यकर्ता की तरह, और एक परिवार के सदस्य की तरह। वर्ष 2020 में जब एनडीए गठबंधन ने भाजपा की परंपरागत सीट तेघड़ा को जदयू के खाते में दे दी, तो हजारों कार्यकर्ताओं का मन व्यथित हुआ। पर संगठन की मर्यादा निभाते हुए मैंने किसी भी प्रकार का विद्रोह नहीं किया। फिर भी संगठन के ही निर्देश पर लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, ताकि भाजपा समर्थक मतदाताओं की भावना का प्रतिनिधित्व किया जा सके। जनता ने मुझे जो समर्थन दिया, वह मेरेसके। जनता ने मुझे जो समर्थन दिया, वह मेरे लिए किसी विजय से कम नहीं था। पिछले पाँच वर्षों में तेघड़ा एक बार फिर नेतृत्वविहीन हो गया। विकास रुका, बेरोज़गारी बढ़ी, और सामाजिक सौहार्द्र की जगह जातीय तनाव ने जड़ें जमा लीं। सनातन समाज के लोग अपमानित हुए, नौजवान भ्रमित हुए, और गरीब तबका अपने अधिकारों से वंचित रहा। हर बार जब मैं किसी गाँव में गया, किसी बुजुर्ग ने आशीर्वाद दिया, किसी युवा ने कंधे पर हाथ रखा तो यही कहा, कुंवर जी, अब आप ही कुछ कीजिए... तेघड़ा को फिर से जगाइए।" 2025 में जब यह सीट पुनः भाजपा के खाते में आई, तो मुझे पूर्ण विश्वास था कि संगठन कार्यकर्ताओं की भावना का सम्मान करेगा। परंतु अफ़सोस, इस बार भी कुछ शीर्ष नेताओं ने अपने स्वार्थ, अहंकार और धनबल के प्रभाव में एक ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी बनाया - जो पिछले 15 वर्षों से हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टीविरोधी कार्यों में लिप्त रहा है। यह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2010 के बछवाड़ा चुनाव, 2014 में बेगूसराय लोकसभा चुनाव में आदरणीय भोला बाबू और 2019 के लोकसभाआदरणीय भोला बाबू और 2019 के लोकसभा चुनावों में वर्तमान सांसद आदरणीय श्री गिरिराज सिंह जी के लिए पार्टी के निर्णय के विपरीत जाकर कार्य किया। ऐसे लोगों को पुरस्कृत करना और वर्षों से संगठन की सेवा में लगे कार्यकर्ताओं को अपमानित करना, यह न केवल अन्याय है, बल्कि भाजपा की कार्यकर्ता संस्कृति के विरुद्ध है। मैंने तेघड़ा विधानसभा के हर पंचायत, हर कार्यकर्ता, हर साथी से संवाद किया। सभी ने एक स्वर में कहा – “अब बहुत हुआ।” इसी भावना के साथ मैंने यह निर्णय लिया है कि मैं तेघड़ा विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड्रॅगा। यह निर्णय किसी व्यक्ति या पार्टी के विरोध में नहीं है, बल्कि उस अवसरवाद, धनबल और चाटुकारिता की राजनीति के विरुद्ध है जिसने कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ा है। मैं भारतीय जनता पार्टी का सच्चा सिपाही था, हूँ और रहूँगा। परंतु जब शीर्ष पर बैठे कुछ लोग संगठन के सिद्धांतों को ताक पर रखकर तानाशाही निर्णय थोपें, तो चुप रहना भी अपराध होता है। मैं उस अपराध में सहभागी नहीं बन सकता। जो सच्चे कार्यकर्ता को हाशिए पर डालकर, अवसरवादियों को मंच देती है। मैं तेघड़ा की जनता के सामने सिर झुकाकर निवेदन करता हूँ – “आपने मुझे विधायक बनाकर देखा है, सेवक बनकर भी देखा है। अब समय है तेघड़ा को पुनः उसके गौरव, विकास और सम्मान की राह पर लाने का।" मैं आशा करता हूँ कि आप मेरी भावना को समझेंगे, मेरा साथ देंगे, और एक बार फिर तेघड़ा में परिवर्तन की अलख जलाएँगे। मैं वचन देता हूँ तेघड़ा का हर व्यक्ति मेरा परिवार है। मैं आपके लिए, आपके अधिकारों के लिए, और तेघड़ा के सम्मान के लिए अंत तक लडूंगा।जय हिंद, जय तेघड़ा। आपका ललन कुंवर


