श्रद्ध भोज पर एक लेख। समाज के सहयोग से होने वाले काम को जबरन श्राद्ध भोज में परिवर्तित किया गया है। एक विद्वान पत्रकार द्वारा लिखा गया आलेख।
बरौनी/ बेगूसराय/ सच आज तक न्यूज़ संवाददाता महंत जीवन दास की रिपोर्ट
दिखावा है,श्राद्ध-भोज,
करें इसका बहिष्कार।
जबरन श्राद्धभोज करवाने
वाले,हैं सामाजिक गद्दार।।
श्राद्ध-भोज का इतिहास--------
श्राद्ध-भोज के आयोजन का इतिहास स्पष्ट करता है कि
जिस घर-परिवार में मृत्यु-शोक होता था, उस घर के सभी प्राणी अत्यंत शोकाकुल होने के कारण भूखे-प्यासे रोते-सिसकते रहते हैं।बेहाल लोगों से जुड़े सामाजिक गोतिया-भैयारी अपने-अपने घरों से चावल-दूध लेकर आते थे,सभी उसे निष्ठा पूर्वक पकाते थे और सबसे पहले कर्त्ता(मुखाग्नि देनेवाले) सहित घर के सभी लोगों को आग्रह पूर्वक नमक विहीन दूध-भात खिलाते थे।इसे आज भी दुध्धी का भोज कहा जाता है।इसी प्रकार एकादशाह, द्वादशाह और त्रेयादशाह के दिन भी सभी एक गोत्रीय सहित स्नेहिल जन अपने-अपने घरों से ही तमाम भोज-सामग्रियों को लाते थे, आग जलाते थे और भोज्य-पदार्थों को पकाकर पहले शोकाकुल परिवार को खिलाते थे, फिर सभी एक साथ पंगत में बैठकर खाते थे।इसप्रकार शोकाकुल परिवार को शोक से मुक्त कराने का प्रयास करते थे, लेकिन राजे-महाराजे सहित समाज के धनी व्यक्तियों ने इस सामाजिक प्रथा को तोड़ दिया।इसका प्रभाव अन्य लोगों पर भी पड़ा।कालान्तर में यह जबरन भी कराया जाने लगा और अब तो हालत यह हो गई है कि जिस घर में शोक होता है,वही उसे स्वयं पकाता है अथवा भोजन बनाने वाले श्रमिकों के माध्यम से बनवाता और सभी गोतिया-भैयारियों सहित पड़ोसियों को भी खिलाता है।कुछ बस्तियों में तो यह भोज जबरन भी कराया जाता है।इस कुकृत्य में शोकाकुल परिवार का जमीन भी लिखा लिया जाता है ,जिसके कारण यह अमानवीय भी हो गया है।
जिसप्रकार से समाजसुधारक राजाराम मोहन राय ने विधवाओं के सती होने की कुप्रथा का विरोध कर अँग्रज़ों से कानून बनाकर उसे बन्द कराया था और बाल-विवाह को समाज का अभिशाप सिद्ध करते हुए बन्द करवाया था, उसी प्रकार आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 'सत्यप्रकाश' पुस्तक लिखकर अन्य कुरीतियों सहित मृत्यु-भोज को भी त्यागने की सलाह दी थी।इस सलाह को आर्यसमाजी तो मानने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अन्य नहीं।इसलिए श्राद्ध-भोज के खिलाफ जन-जागरण-क्रान्ति की अपरिहार्य आवश्यकता बलवती हो चुकी है।जनक्रान्ति के उपरांत ही इस कुव्यवस्था का अंत किया जा सकता है।
संसार में सर्वप्रथम श्राद्धभोज कहाँ हुआ?और किसने किया, यह एक शोध का विषय है।इस पर सामाजिक शोध होना समय की माँग हो चुकी है।
श्राद्धभोज के विरुद्ध अगर
होगी क्रान्ति तुरन्त।
तब आज नहीं तो कल होगा, श्राद्धभोज का अंत।।
आपकी जय हो, हेपत्रकारश्रेष्ठ!यशःकीर्तिवर्द्धतेनित्यम् हेसामाजिकसंतमहंथ!आपकी आज्ञा पर तुरन्त लिख दिया हूँ, लेकिन इतना संकल्प करता हूँ कि इस विषय पर किसी शोधार्थी से शोध अवश्य करवाऊँगा।मैं आपके श्राद्धभोज-विरोध-क्रान्ति में साथ हूँ।यह एक लम्बी लड़ाई है।इसे पीढ़ियों को सौंपने की आवश्यकता है।आपकी जय हो।आप लिखते रहें और सुन्दर दिखते रहें।जो लिखता है, वही सुन्दर दिखता है।अभी तो आपको पत्रकार बनाया हूँ, अब आपको कहानीकार बनाऊँगा, इसे याद रखिए!आप अच्छी कहानियों का प्रणयन(लेखन)कर सकते हैं।यशस्वी भव!दीर्घायु भव!लक्ष्मीवन्तम्भव!लक्ष्यव्रतीभव!आयुर्शक्तिर्यशोबलंवर्द्धतेनित्यम्, आनंदंवर्द्धतेअहर्निशम्, मंगलम् हेमंगलमयी!




