तेघड़ा के राजकीय नलकूपों के सिंचाई की सरकारी व्यवस्था नाकारा साबित
आर एम न्यूज़ मीडिया संवाददाता अशोक कुमार ठाकुर की खास रिपोर्ट
बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। जिसकी 80 फीस दी जनसंख्या कृषि पर आधारित है।
सरकार किसानों की आर्थिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण योजनाएं बना रही है। किसानों के उत्थान के लिए लगातार घोषणाएं कर रही है। परन्तु, सरकार की ये योजनाएं धरातल पर दम तोड़ रही है। इसका जीता जागता उदाहरण तेघड़ा में देखा जा सकता है जहां फसलों की सिंचाई की कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है। यहां के राजकीय नलकूप पुराने जमाने की मात्र धरोहर बनकर रह गई है। इन राजकीय नलकूपों से पानी नहीं निकल रहा है जिसके कारण किसानों को फसल की सिंचाई के लिए निजी नलकूपों पर ही निर्भर करना पड़ रहा है जो काफी मंहगा साबित हो रहा है। प्रखंड के लगभग 26 राजकीय नलकूपों में दो-तीन छोड़कर सभी वर्षों से बन्द हालत में हें। पकठौल गांव स्थित एक राजकीय नलकूप चालू हालत में है जो किसी सरकारी कर्मी के नियंत्रण में नहीं है। इस राजकीय नलकूप को एक निजी व्यक्ति संचालित कर रहा है। पकठौल पंचायत के किरतौल 2 नलकूप की मरम्मती के नाम पर पूर्व मुखिया इंद्रदेव सहनी के द्वारा वर्ष 2019 में तीन लाख रुपया निकासी के बावजूद भी उसमें एक ईट तक नहीं लगाया गया ।और नाहीं वह राशि सरकारी खाते में जमा की गई और ना ही वैसे व्यक्ति पर कोई विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित किया गया। वहां के स्थानीय मुखिया सहित ग्रामीणों ने कई बार नलकूप विभाग के एसडीओ से जांच और कार्रवाई की मांग की लेकिन मामला ढ़ाक का पात साबित हुआ।जानकारी के अनुसार सन 1973 ई. में राजकीय नलकूपों को चालू करवाया गया था। इन नलकूपों की देखरेख और संचालन के लिए विभाग ने ऑपरेटर की बहाली भी की थी। इन नलकूपों के जरिए किसानों को सस्ती दर पर सिंचाई कार्य के लिए पानी उपलब्ध करवाया जाता था। परंतु, विभाग के अधिकारियों की उदासीनता के कारण धीरे-धीरे इन नलकूपों की स्थिति खराब हो गई। कहीं मोटर जल गया है तो कहीं नाला टूटा पड़ा है। कहीं विद्युत तार जर्जर होकर गिर गया तो कहीं चोरों ने इन बिजली तारों को काट लिया। कहीं, मशीन में तकनीकी गड़बड़ी आ गई। कई नालियों का अतिक्रमण कर अस्तित्व ही मिटा दिया गया है।धीरे-धीरे नलकूपों के ऑपरेटरों के सेवानिवृत्त हो जाने से राजकीय नलकूपों की स्थिति बिगड़ गई। जानकारी के अनुसार वर्ष 2011 में भी नलकूप लगवाए गए। इनमें भी कुछ राजकीय नलकूप फ्लॉप साबित हुए। वहीं, सरकार द्वारा नलकूप चालकों की बहाली प्रकिया नहीं की गई जिससे राजकीय नलकूपों की देखरेख और संचालन का कार्य बिल्कुल ठप हो गया। किसान नेता दिनेश सिंह ने बताया कि राजकीय नलकूपों के बन्द हो जाने से किसानों को करीब डेढ़ सौ से दो सौ रुपए प्रति घंटे की दर से सिंचाई करनी पड़ रही है। उन्होंने बताया कि रबी फसल की सिंचाई का समय शुरू हो गया है। अभी सरसों एवं मक्का , सब्जी और गेहूं फसल का पटवन भी चल रहा है। परन्तु राजकीय नलकूपों के बंद रहने से उनलोगों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। महंगे बीज, महंगी खाद और महंगी जुताई का दंश झेल रहे किसानों को महंगी सिंचाई व्यवस्था की मार भी झेलनी पड़ रही है। कृषि कार्य में बचत तो दूर की बात है, लागत मूल्य भी वापस नहीं मिलता है। यदि क्षेत्र के सभी राजकीय नलकूपों को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था की जाए तो किसानों को काफी राहत मिलेगी। इस संदर्भ में प्रखण्ड विकास पदाधिकारी राकेश कुमार ने बताया कि बन्द पड़े राजकीय नलकूपों की सूची बनाई जा रही है। इस सूची को विभागीय अधिकारियों को उपलब्ध कराया जाएगा। वहीं, दूसरी ओर क्षेत्र की विभिन्न पंचायतों के मुखिया ने बताया कि ठप पड़े राजकीय नलकूपों को जब तक ठीक कर चालू नहीं किया जाएगा तब तक सिंचाई की व्यवस्था सुदृढ़ नहीं हो पाएगी।









